JKBOSE 9th Class Hindi Solutions chapter – 5 साखियाँ, सबद (पद) —कबीर

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कवि – परिचय
संत कबीर हिंदी-साहित्य के भक्तिकाल की महान् विभूति थे उन्होंने अपने बारे में कुछ न कह कर भक्त, सुधारक और साधक का कार्य किया था। माना जाता है कि उनका जन्म सन् 1398 ई० में काशी में हुआ था तथा उन की मृत्यु सन् 1518 में काशी के निकट मगहर में हुई थी। उनका पालन-पोषण नीरु और नीमा नामक एक निस्संतान जुलाहा दंपति के द्वारा किया गया था। कबीर विवाहित थे। उनकी पत्नी का नाम लोई था । कबीर ने स्वयं संकेत दिया है कि उनका एक पुत्र और एक पुत्री थी जिन के नाम कमाल और कमाली थे।
कबीर निरक्षर थे पर उन का ज्ञान किसी विद्वान् से कम नहीं था। वे मस्तमौला, फक्कड़ और लापरवाह फकीर थे। वे जन्मजात विद्रोही, निर्भीक, परमसंतोषी और क्रांतिकारक सुधारक थे। उन्हें न तो तत्कालीन शासकों का कोई भय था और न ही विभिन्न धार्मिक संप्रदायों का । कबीर की प्रामाणिक रचना ‘बीजक’ है, जिसके तीन भाग हैं- साखी, सबद और रमैनी। इनकी कुछ रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहब में भी संकलित हैं।
कबीर निर्गुणी थे। उनका मानना था कि ईश्वर इस विश्व के कण-कण में विद्यमान है। वह फूलों की सुगंध से भी पतला, अजन्मा और निर्विकार है। उसे कहीं बाहर ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह तो सदा हमारे साथ है। कबीर ने गुरु को परमात्मा से भी अधिक महत्त्व दिया है क्योंकि परमात्मा की कृपा होने से पहले गुरु की कृपा का होना आवश्यक है। गुरु ही अपने ज्ञान से शिष्य के अज्ञान को समाप्त करता है। कबीर ने हिंदूमुसलमानों में प्रचलित विभिन्न अंधविश्वासों, रूढ़ियों और आडंबरों का कड़ा विरोध किया था। वे बहुदेववाद और अवतारवाद में विश्वास नहीं करते थे। वे मानवधर्म की स्थापना को महत्त्व देते थे इसलिए उन्होंने जाति-पाति और वर्ग-भेद का विरोध किया। वे हिंदूमुसलमानों में एकता स्थापित करना चाहते थे। उनका मत था कि भजन सदा मन में होना चाहिए। दिखावे के लिए चिल्ला-चिल्ला कर भक्ति का ढोंग करने से भगवान् नहीं मिलते। वे आत्मशुद्धि अधिक महत्त्वपूर्ण है। मानवतावादी समाज की स्थापना की जानी चाहिए । शासन, समाज, धर्म आदि समस्त क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते थे।
कबीर की भाषा जन भाषा के निकट थी। उन्होंने साखी, दोहा, चौपाई की शैली में अपनी वाणी प्रस्तुत की थी। उस में गीत तत्व के सभी गुण विद्यमान हैं। उनकी भाषा में अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, पूर्वी हिंदी, फारसी, अरबी, राजस्थानी, पंजाबी आदि के शब्द बहुत अधिक हैं। इनकी भाषा को खिचड़ी भी कहते हैं। निश्चित रूप से कबीर युग प्रवर्तक क्रांतिकारी थे।
1. सारिवयाँ
साखियों का सार
संत कबीर ने निर्गुण भक्ति के प्रति अपनी आस्था के भावों को प्रकट करते हुए माना है कि हृदय का मानसरोवर भक्ति जल से पूरी तरह भरा हुआ है जिसमें हँस रूपी आत्माएँ मुक्ति रूपी मोती चुनती हैं। अपार आनंद प्राप्त करने के कारण वे अब उसे छोड़ कर कहीं भी और नहीं जाना चाहतीं। जब परमात्मा से प्रेम करने वाले साधु जन आपस में मिल जाते हैं तो जीवन में सुख ही सुख शेष रह जाते हैं। जब भक्ति ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ती है तो संसार में विरोध करने वाले उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते । पक्ष-विपक्ष के कारण सभी परमात्मा के नाम से दूर रहते हैं। इससे दूर होकर जो परमात्मा का स्मरण करता है वही संत कहलाता है। आडंबरों और परमात्मा का नाम लेने के लिए ढोंग करने से उसकी प्राप्ति नहीं होती। यदि कोई ऊँचे परिवार में जन्म लेकर श्रेष्ठ कार्य नहीं करता तो पूजनीय नहीं हो सकता। सोने के कलश में भरी शराब की भी निंदा की जाती है; प्रशंसा नहीं।
सप्रसंग व्याख्या
1. मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं ।
मुकुताफल मुकता चुगेँ, अब उड़ि अनत न जाहिं । 
शब्दार्थ— सुभर = अच्छी तरह भरा हुआ । केलि = क्रीड़ा, खेल । हंसा = हृदय रूपी जीव । मुकुताफल = मोती । उड़ि = उड़कर । अनत = अन्यत्र कहीं ओर।
प्रसंग— प्रस्तुत साखी हमारी पाठ्य पुस्तक ‘भास्कर’ भाग-1 में संकलित ‘साखियाँ’ से ली गई है जिसके रचयिता संत कबीर हैं। जब मानव के हृदय में भक्ति का भाव पूरी तरह से भरा होता है तो उस का ध्यान किसी दूसरी तरफ नहीं जाता । वह तो भक्ति-भाव में डूबा रहना चाहता है।
व्याख्या— कबीर कहते हैं कि हृदय रूपी मान सरोवर जब भक्ति के जल से पूरी तरह भरा हुआ होता है तो हंस रूपी आत्माएँ उसी में क्रीड़ाएँ करती हैं। वे आनंद में भर कर मुक्ति रूपी मोतियों को वहाँ से चुगते हैं। वे उड़कर, विमुख होकर अब अन्य साधनाओं को नहीं अपनाना चाहतीं। भाव है कि परमात्मा के नाम में डूब जाने वाले भक्त स्वयं को भक्ति भाव में ही लीन रखने के प्रयत्न करते हैं तथा सांसारिक विषय-वासनाओं से दूर ही रहते हैं।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) कवि की दृष्टि में ‘मान सरोवर’ और ‘सुभर जल’ का क्या गहन अर्थ है ?
(ख) कवि ने हंस किसे माना है?
(ग) हंस कहीं भी उड़ कर क्यों नहीं जाना चाहते ?
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य प्रतिपादित कीजिएl
उत्तर— (क) कवि की दृष्टि में मानसरोवर किसी भक्त का वह मन है जिसमें भकि रूपी जल पूरी तरह से भरा हुआ है। ‘सुभर जल’ से यह प्रकट होता है कि भक्त के में भक्ति भावों के अतिरिक्त किसी प्रकार के विकारी भाव नहीं हैं। वह भक्ति-भावों इतना अधिक भरा हुआ है कि सांसारिक विषय-वासनाओं के वहाँ समाने का कोई स्थान ही नहीं है।
(ख) कवि ने भक्तों, संतों और साधुओं को हंस माना है जो भक्ति-भाव में सदा डूबे रहते है।
(ग) भक्त रूपी हँस मुक्ति रूपी मोतियों को चुगने के कारण कहीं भी उड़ कर नहीं जाना चाहते।
(घ) कबीर के द्वारा रचित साखी में दोहा छंद है जिसमें स्वरमैत्री का सहज प्रयोग किया गया है जिस कारण लयात्मकता की सृष्टि हुई है। अनुप्रास और रूपक का सहन स्वाभाविक प्रयोग सराहनीय है। लक्षणा शब्द शक्ति के प्रयोग ने कवि के कथन को गंभीरता और भाव प्रवणता प्रदान की है। शांत रस विद्यमान है। तद्भव शब्दों की अधिकता है।
2. प्रेमी ढूँढत मैं फिरौँ, प्रेमी मिले न कोड़। 
प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ ॥
शब्दार्थ — विष = विषय-वासनाएँ रूपी विष
प्रसंग— प्रस्तुत साखी हमारी पाठ्य पुस्तक ‘भास्कर’ भाग-1 में संकलित ‘साखियां’ से ली गई है जिसके रचयिता संत कबीर हैं। ईश्वर भक्त सदा अपने जैसे भक्त को ढूंढ़ता रहता है और जब भी उसे अपने उद्देश्य में सफलता मिल जाती है वह पूरी तरह से इस संसार से विमुख हो जाता है।
व्याख्या— कबीर कहते हैं कि मैं परमात्मा के नाम से प्रेम करने वाला अपने जैसे किसी प्रभु के प्रेमी को खोज रहा हूँ पर मुझे कोई प्रभु – प्रेमी मिल नहीं रहा। जब एक भक्त को दूसरा भक्त मिल जाता है तो उस के लिए संसार की सभी विषय-वासनाएँ मिट जाती हैं। उनका विषय वासना रूपी विष समाप्त हो जाता है तथा वे अमृत के समान हो जाती हैं। भाव है कि जब किसी प्रभु-प्रेमी को अपने जैसा प्रभु-प्रेमी मिल जाता है तो उन दोनों की प्रभु-भक्ति परिपक्व हो जाती है और फिर उन्हें माया से भरे संसार के प्रति कोई रुचि नहीं रह जाती।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) कबीर ने प्रेमी किसे कहा है ? 
(ख) प्रेमी को अपने-सा प्रेमी क्यों नहीं मिलता ? 
(ग) प्रेमी को प्रेमी मिल जाने से सारा विष अमृत क्यों हो जाता है ? 
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य प्रतिपादित कीजिए। 
उत्तर— (क) कबीर ने परमात्मा के भक्त को प्रेमी कहा है।
(ख) परमात्मा का भक्त अपने जैसे भक्त को पाना चाहता है पर वह सरलता से मिलता नहीं क्योंकि संसार के अधिकांश लोग तो भक्ति से दूर रह कर विषय-वासनाओं में डूबे रहते है।
(ग) ईश्वर प्रेमी को ईश्वर प्रेमी मिल जाने से सारा विष अमृत हो जाता है क्योंकि उन्हें भक्ति रूपी अमृत की प्राप्ति की ही इच्छा होती है; विषय-वासनाओं की नहीं।
(घ) कबीर ने सीधी-साधी सरल भाषा में भक्ति-रस के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। ‘प्रेमी’ में लाक्षणिकता विद्यमान है। तत्सम और तद्भव शब्दों का समन्वित प्रयोग किया गया है। प्रसाद गुण तथा शांत रस विद्यमान हैं। दोहा छंद का प्रयोग है। स्वरमैत्री ने गेयता का गुण प्रदान किया है।
3. हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि ॥
शब्दार्थ— हस्ती = हाथी कर रख कर। स्वान = कुत्ता बेकार करना । = दुलीचा = कालीन, छोटा आसन, गलीचा डारि= डाल भूँकन दे = भौंकने दो। झख मारना = मजबूर होना; वक्त
प्रसंग— प्रस्तुत साखी संत कबीर दास के द्वारा रचित है। कवि का मानना है कि यह संसार तो अज्ञानी है और सभी के प्रति व्यर्थ ही कुछ न कुछ कहता रहता है इसलिए इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।
व्याख्या— कबीर कहते हैं कि हे मानव, तुम ज्ञान रूपी हाथी पर सहज स्वरूप स्थिति का गलीचा डालो। यह संसार तो अज्ञानी है; यह तो कुत्ते के समान है जो व्यर्थ ही भौंकता रहता है। उसकी परवाह किए बिना तुम उसे व्यर्थ भौंक कर अपना वक्त बेकार करने दो और तुम भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते जाओ।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) कवि ने संसार के व्यवहार को कैसा माना है? 
(ख) कवि की दृष्टि में ज्ञान का रूप कैसा है ?
(ग) ‘सहज दुलीचा’ क्या है ?
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर— (क) कवि ने संसार के उस व्यवहार को अनुचित माना है जो व्यर्थ ही दूसरों की आलोचना करता रहता है । वह तो अच्छे-बुरे के बीच भेद भी नहीं कर पाता ।
(ख) कवि की दृष्टि में ज्ञान हाथी के समान सबल है जो अपना मार्ग खुद बना सकता है जिसे किसी की परवाह नहीं होती।
(ग) ‘सहज दुलीचा’ ईश्वर के नाम की स्व स्वरूप स्थिति है जो भक्त के मन को ईश्वर की ओर बढ़ाती है।
(घ) कबीर ने भक्ति के मार्ग में आगे बढ़ने वालों को प्रेरणा दी है कि वे व्यर्थ की आलोचनाओं की परवाह न करें। दोहा छंद में तत्सम और तद्भव शब्दों का सहज प्रयोग किया गया है। लाक्षणिकता ने भाव गहनता को प्रकट किया है। स्वर मैत्री ने गेयता का गुण उत्पन्न किया है। शांत रस का प्रयोग है।
4. पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान ।
निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान ΙΙ
शब्दार्थ— पखापखी = पक्ष-विपक्ष जग= संसार कारनै = कारण सोई = वही सुजान = चतुर, ज्ञानी ।
प्रसंग— प्रस्तुत साखी हमारी पाठ्य पुस्तक ‘भास्कर’ भाग-1 में संकलित ‘सांखियाँ’ से ली गई है जिसके रचयिता निर्गुण भक्ति के संत कबीर हैं। यह संसार आपसी लड़ाई झगड़े और तेरा-मेरा करते हुए भक्ति मार्ग से दूर होता जा रहा है जो उसके लिए उचित नहीं है।
व्याख्या— कबीर कहते हैं कि यह संसार पक्ष-विपक्ष के झगड़े में उलझ कर ईश्वर के नाम को भुला कर इस से दूर होता जा रहा है। उसके लिए तेरे मेरे का भेद ही प्रमुख है। जो व्यक्ति निरपक्ष होकर ईश्वर का नाम भजता है वही चतुर – ज्ञानी संत है। भाव यह है कि यह संसार तो झूठा है और इसे यहीं रह जाना है। इस संसार को छोड़ने के बाद मनुष्य के साथ यह नहीं जाएगा बल्कि उसकी भक्ति और सद्कर्म जाएँगे। इसलिए उसे ईश्वर के नाम की ओर उन्मुख होना चाहिए ।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) ‘पखापखी’ क्या है ?
(ख) सारा संसार किसे भुला रहा है ?
(ग) संत-सुजान कौन हो सकता है ?
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर— (क) मानव मन में छिपी तेरे मेरे, पक्ष-विपक्ष और परस्पर लड़ाई-झगड़े का भाव ही पखापखी है ।
(ख) सांसारिकता में उलझ कर यह सारा संसार ईश्वर के नाम और भक्ति-भाव को भुला रहा है।
(ग) संत-सुजान वही हो सकता है जो अपसी भेद-भाव को त्याग कर परमात्मा के नाम के प्रति स्वयं को लगा दे ।
(घ) कबीर ने दोहा छंद का प्रयोग करते हुए उपदेशात्मक स्वर में प्रेरणा दी है कि मानव को आपसी लड़ाई-झगड़े और भेद-भाव को मिटाकर ईश्वर के नाम की ओर उन्मुख होना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता है वही ‘संत सुजान’ कहलाने के योग्य है । तद्भव शब्दावली का सहज प्रयोग किया गया है। अनुप्रास अलंकार का सहज-स्वाभाविक प्रयोग सराहनीय है। प्रसाद गुण और शांत रस विद्यमान है। स्वरमैत्री ने लयात्मकता का गुण प्रदान किया है।
5. हिंदू मुआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ ।
कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकट न जाइ ॥ 
शब्दार्थ— मुआ = मर गया। खुदाइ = परमात्मा । निकट = पास ।
प्रसंग— प्रस्तुत साखी हमारी पाठ्य पुस्तक ‘भास्कर’ भाग – 1 में संकलित ‘साखियाँ’ से ली गई है जिसके रचयिता निर्गुण संत कबीर हैं। मनुष्य परमात्मा के रहस्य को बिना समझे धर्मों के बंधनों में पड़ा रहता है और स्वयं को परमात्मा के नाम से दूर कर लेता है।
व्याख्या— कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान ईश्वर के वास्तविक सच को समझे बिना क्रमशः राम और अल्लाह शब्दों को दुराग्रहपूर्वक पकड़ कर डूब मरे। इस संसार में वह सावधान है जो इन दोनों के फैलाए धोखे के जाल में नहीं फंसता और सार्वभौमिक सत्यता को समझता है कि प्रत्येक प्राणी के हृदय में बसने वाला चेतन ही राम और अल्लाह है।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) हिंदू और मुसलमान ईश्वर को किस-किस नाम से पुकारते हैं ? 
(ख) कवि के अनुसार कौन-सा मानव सावधान है ?
(ग) कवि ने किस सार्वभौमिक सत्य को प्रकट करने का प्रयत्न किया है ?
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य प्रतिपादित कीजिए। 
उत्तर— (क) हिंदू ईश्वर को राम नाम से और मुसलमान खुदा नाम से पुकारते हैं।
(ख) कवि के अनुसार वह मानव सावधान है जो हिंदुओं और मुसलमानों के राम और अल्लाह शब्दों को दुराग्रहपूर्वक स्वीकार नहीं करता।
(ग) कवि ने इस सार्वभौमिक सत्य को प्रकट करने का प्रयत्न किया है कि परमात्मा तो हर प्राणी के हृदय में बसता है। वह किसी धर्म विशेष के अधिकार में नहीं है।
(घ) कबीर ने माना है कि परमात्मा घट-घट में समाया हुआ है । वह केवल ‘राम’ या ‘अल्लाह’ नामों में छिपा हुआ नहीं है। उसे तो हर कोई पा सकता है। अभिधा शब्द शक्ति के प्रयोग ने कवि के कथन को सरलता और सहजता प्रदान की है। प्रसाद गुण और शांत रस विद्यमान है। अनुप्रास अलंकार का सहज प्रयोग है। गेयता का गुण विद्यमान है।
6. काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम l
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ॥
शब्दार्थ— काबा = मुसलमानों का पवित्र तीर्थस्थल ।  काशी, वाराणसी । भया = हो गया। मोट कासी =  मोटा। चून = आटा।
प्रसंग— प्रस्तुत साखी महात्मा कबीर के द्वारा रचित है। परमात्मा घट-घट में समाया हुआ है । वह न तो किसी विशेष तीर्थस्थान पर है और न ही किसी विशेष नाम से जाना जाता है। उसे मन की भावना और भक्ति के भाव से स्मरण करो तो वह तुम्हें प्राप्त हो जाएगा।
व्याख्या— कबीर कहते हैं कि चाहे मुसलमानों के पवित्र धार्मिक स्थल काबा में जाओ या हिंदुओं की धार्मिक नगरी काशी में ; चाहे उसे राम के नाम से ढूंढ़ो या रहीम में—वह वास्तव में एक ही है। उसमें कोई भेद नहीं है। वह तो सार्वभौमिक सत्य है जो सब जगह एक-सा ही है। मनुष्य अपनी भिन्न सोच के कारण उसे अलग-अलग चाहे मानता रहे । मोटा आटा ही तो मैदे में बदलता है। उन दोनों में कोई मौलिक भेद नहीं है । हे मानव ! तू उन्हें बैठ कर बिना किसी भेद-भाव के खा; अपना पेट भर । भाव हैं कि परमात्मा को चाहे कही भी ढूंढ़ो और किसी भी नाम से पुकारो पर वास्तव में वह एक ही है ।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) कवि ने ‘काबा’, ‘कासी’, ‘राम’, ‘रहीम’ शब्दों के माध्यम से प्रकट करना चाहा है ?
(ख) ‘मोट चून मैदा भया’ में निहित अर्थ स्पष्ट कीजिए। 
(ग) कबीर ने किस भाव का विरोध किया है ?
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य को प्रतिपादित कीजिए। 
उत्तर— (क) कवि ने ‘काबा’ और ‘काशी’ के माध्यम से प्रकट करना चाहा है कि परमात्मा किसी विशेष धार्मिक स्थल पर प्राप्त नहीं होता बल्कि वह तो सभी जगह है मिलता है। ‘राम’ और ‘रहीम’ शब्दों के माध्यम से यह कहना चाहा है कि परमात्मा प्रत्येक धर्म में एक ही है। उस के नाम बदलने से वह नहीं बदल जाता। उसे किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है।
(ख) जिस प्रकार मोटा आटा ही मैदा में बदल जाता है उसी प्रकार विभिन्न धर्मों को मानने वाले ईश्वर को भिन्न नामों से पुकार लेते हैं और उसके स्वरूप में भेद मानते हैं प वास्तव में उस में कोई भेद नहीं है। ईश्वर तो एक ही है।
(ग) कबीर ने इस भाव का विरोध किया है कि ईश्वर के रूप, नाम अनेक हैं; स्वरूप अलग हैं और वह भिन्न धर्मों को मानने वालों के धर्म-स्थलों पर रहता है। वास्तव में ईश्वर एक ही है। उस में कोई अंतर नहीं है।
(घ) कबीर मानते हैं कि परमात्मा सर्वत्र है। हिंदू-मुसलमान चाहे उसे अलग-अलग नाम से पुकारते हैं पर वास्तव में उस में कोई अंतर नहीं है। अनुप्रास और दृष्टांत अलंकारों का सहज प्रयोग सराहनीय है। अभिधा शब्द शक्ति के प्रयोग ने कवि के कथन को सरलता और सरसता प्रदान की है। प्रसाद गुण और शांत रस का प्रयोग है, स्वरमैत्री ने लय की उत्पत्ति की है।
7. ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होय ।
सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोय ॥
शब्दार्थ— जनमिया = जन्म लिया। करनी = कार्य सुबरन= स्वर्ण, सोना । सुरा मदिरा, शराब । सोय = उस की ।
प्रसंग— प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित ‘साखियाँ’ से ली गई है। इसमें कवि ने सज्जन और दुर्जन की संगति के परिणामों का वर्णन किया है।
व्याख्या— इस साखों में कवि कहता है कि ऊँचे वंश में जन्म लेने का भी कोई लाभ नहीं है यदि हमारे काम ऊँचे नहीं हैं। क्योंकि यदि सोने का कलश मदिरा से भरा हो तो सज्जन उस की भी निंदा ही करते हैं। केवल ऊँचे वंश में जन्म लेने से ही कोई महान् नहीं हो जाता उसे ऊँचा उसके महान् कार्य बनाते हैं।
साखी पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) कबीर ने किस व्यक्ति को ‘ऊँचा’ नहीं माना ?
(ख) साधु किस की निंदा करते हैं ?
(ग) कोई व्यक्ति किस कारण महान् बन जाता है ?
(घ) साखी में निहित काव्य-सौंदर्य को प्रतिपादित कीजिए। 
उत्तर— (क) कबीर ने उस व्यक्ति को ऊंचा नहीं माना जो अवगुणों से भरा हुआ हो। किसी भी व्यक्ति को केवल ऊंचे परिवार में जन्म लेना ही महान् नहीं बनाता।
(ख) साधु प्रत्येक उस व्यक्ति की निंदा करते हैं जो दुर्गुणों से भरे हुए हैं।
(ग) कोई व्यक्ति अपने द्वारा किए जाने वाले सत्कर्मों और अपने सद्गुणों से महान् बन जाता है।
(घ) कबीर के द्वारा रचित उपदेशात्मक शैली की साखी में किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता उस के सद्गुणों में मानी गई है जबकि उस के ऊंचे परिवार में स्वरमैत्री के प्रयोग ने कवि की वाणी को लयात्मकता प्रदान की है। अनुप्रास का सहज प्रयोग किया गया है। प्रसाद गुण और अभिधा शब्द शक्ति ने कथन को सरलता और सरसता प्रदान की है। शांत रस विद्यमान है। तद्भव शब्दावली की अधिकता है।
2. सबद (पद) 
पदों का सार
निर्गुण भक्ति के प्रति अपने निष्ठाभाव को प्रकट करते हुए कबीर मानते हैं कि ईश्वर मनुष्य अपने अज्ञान के कारण इधर-उधर ढूंढ़ने का प्रयास करता है। वह नहीं जानता कि ईश्वर तो उस के अपने भीतर ही छिपा हुआ है। न तो वह मंदिर में है और न ही मस्जिद में, न काबा में और न ही कैलाश पर्वत पर । वह किसी आडंबर, योग, विराग और क्रियाकर्म से प्राप्त नहीं होता। यदि उसे अपने भीतर से ही ढूंढ़ने का प्रयत्न किया जाए तो वह सरलता से प्राप्त हो सकता है क्योंकि वह तो प्रत्येक व्यक्ति के श्वासों में बसता है। पल भर की तलाश से ही उसे पाया जा सकता है।
कबीर मानते हैं कि उनके हृदय में ज्ञान की आंधी चलने लगी है जिस कारण भ्रम रूपी छप्पर उड़ गया है, जिसमें ब्रह्म छिपा हुआ था। अब माया उसे बांध कर नहीं रख सकती । ज्ञान की आंधी के बाद शरीर कपट से रहित हो गया और ईश्वर के प्रेम की उस पर वर्षा हो गई। इससे भक्त जन प्रभु के प्रेम-रस में भीग गए। परमात्मा की भक्ति का उजाला सर्वत्र हो गया।
सप्रसंग व्याख्या
1. मोकों कहाँ ढूंढे बंदे, मैं तो तेरे पास में । 
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में। 
ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में । 
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तालास में। कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वांसों की स्वांस में ॥ 
शब्दार्थ— मोकों = मुझे | बंदे = मानव । देवल = मंदिर। काबे = काबा, मुसलमानों का पवित्र तीर्थस्थल । कैलास = कैलाश पर्वत। कौने = किसी बैराग= वैराग्य । तुरतै शीघ्र, तुरन्त ही। तालास = खोज।
प्रसंग— प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य पुस्तक ‘भास्कर’ भाग-1 से संकलित है जिसे सं कबीर ने रचा है। कवि का मानना है कि ईश्वर की प्राप्ति कहीं बाहर से नहीं होती बल्कि वह तो सर्वत्र विद्यमान है। उसे तो अपने भीतर की पवित्रता से ही प्राप्त किया जा सकता है।
व्याख्या— कबीर के अनुसार निर्गुण ब्रह्म मानव को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे मानव! तुम मुझे कहां ढूंढ़ते फिरते हो? मैं तो तुम्हारे ही पास हूं। मैं न तो मंदिर में है और न ही मस्जिद में। मैं न मुसलमानों के पवित्र तीर्थस्थल काबा में बसता हूं और न ही हिंदुओं के धार्मिक स्थल कैलाश पर्वत पर । मैं किसी भी क्रिया-कर्म और आडम्बर में नहीं हूं और न ही मेरी प्राप्ति योग-साधनाओं से हो सकती है। मैं वैराग्य धारण करने से भी नहीं मिलता । यदि तुम वास्तव में ही मुझे खोजना चाहते हो तो मैं तुम्हें पल भर की तालाश में मिल जाऊंगा। तुम अपने मन की पवित्रता से मुझे प्राप्त करने का प्रयत्न करो। कबीर कहते हैं कि हे भाई, साधुओ, सुनो। मैं तो तुम्हारी सांसों के सांस में बसता हूं। मुझे अपने भीतर से ही खोजने का प्रयत्न करो ।
पद पर आधरित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न–
प्रश्न (क) कवि ने किस शैली में किसे सम्बोधित किया है ? 
(खं ) निर्गुण ब्रह्म कहां-कहां पर नहीं मिलता है ? 
(ग) ब्रह्म की प्राप्ति कहां हो सकती है ? 
(घ) पद में निहित काव्य-सौंदर्य प्रतिपादित कीजिए। 
उत्तर— (क) कवि ने निर्गुण ब्रह्म के द्वारा आत्मकथात्मक शैली में उन मानवों को सम्बोधित किया है जो परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं।
(ख) निर्गुण ब्रह्म को मंदिर, मस्जिद, काबा, कैलाश, क्रिया-कर्म, आडम्बर, योग, वैराग्य आदि में नहीं पाया जा सकता।
(ग) ब्रह्म की प्राप्ति तो पल भर की तालाश से ही संभव है क्योंकि वह तो हर प्राणी के भीतर उसकी सांसों की सांस में बसता है। हर प्राणी को ब्रह्म अपने भीतर से ही प्राप्त होता है।
(घ) कबीर ने निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए किसी भी प्रकार के आडम्बर का विरोध किया है और माना है कि उसे अपने हृदय की पवित्रता से अपने भीतर ही ढूंढ़ा जा सकता है। कवि ने तद्भव शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया है । लयात्मकता का गुण विद्यमान है। अनुप्रास अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग सनाहनीय है। प्रसाद गुण, अभिधा शब्दशक्ति और शांत रस ने कथन को सरलता और सहजता प्रदान की है।
2. संतौं भाई आई ग्याँन की आंधी रे ।
भ्रम की टाटी सबै उड़ाँनी, माया रहै न बाँधी ॥ 
हिति चित्त की द्वै यूँनी गिराँनी, मोह बलिँडा तूटा ॥
त्रिस्नोँ छाँनि पर घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा ॥
जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी ॥
कूड़कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी॥ 
आँधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदति भया तम खीनाँ ।
शब्दाथ— भ्रम = धोखा। टाटी = छप्पर, परदे के लिए लगाया हुआ बांस आदि की फट्टियों का पल्ला। दुचिते = दुविधा से ग्रस्त । दुई = दोनों थूनि = स्तंभ, खंबे, जिन पर छप्पर टिकता है। गिरानी = गिर गए। बलिंडा = छप्पर को संभालने वाला आधारभूत म्याल (खंबा) | त्रिस्नाँ = तृष्णा, लालच छांनि = छप्पर | दुमिति = बुद्धि । भांडा फूटा = भेद खुल गया । निरचू = थोड़ा भी। चुवै = रिसता है, चूता है। बूठा = बरसा। पीछे = पीछे, बाद में। भानु = सूर्य । तम = अंधेरा। खीनां = क्षीण हुआ।
प्रसंग— प्रस्तुत पद महात्मा कबीरदास के पदों से संकलित किया गया है। इसमें रहस्यात्मकता तथा तत्कालीन परिस्थितियों की सुंदर अभिव्यक्ति हो पाई है। यह पद कबीर की दार्शनिक मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता है। ज्ञान के प्रभाव से अज्ञान और भ्रम रूपी छप्पर उड़ जाता है और जीवात्मा की तृष्णा मिट जाती है।
व्याख्या— हे भाई! मेरे हृदय में ज्ञान रूपी आंधी चलने लगी है। इससे भ्रम रूपी छप्पर उड़ गया है, जिसमें ब्रह्म छिपा हुआ था। माया अब जीव को बांध कर नहीं रख सकती । इस छप्पर की सारी सामग्री छिन्न-भिन्न हो गई है। मन के दुविधा रूपी दोनों खंभे गिर गये हैं जिन पर यह टिका हुआ था। इसे छप्पर का आधारभूत मोह रूपी ‘खंभा’ भी टूट गया है और तृष्णा रूपी छान ज्ञान की आंधी से टूट कर भूमि पर गिर गया है। कुबुद्धि का घड़ा फूट गया है। अज्ञान और विषय-वासना का जीवन में कोई स्थान नहीं रहा है। शरीर कपट से रहित हो गया है। ज्ञान की आंधी के पश्चात् भगवान् के प्रेम और अनुग्रह की वर्षा हुई है जिससे भक्तजन प्रभु प्रेम के रस में भीग गये हैं। कबीरदास जी कहते हैं कि ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होते ही अज्ञान का अंधकार क्षीण हो गया है। ज्ञान और परमात्मा की भक्ति का सर्वत्र उजाला हो गया ।
पद पर आधारित अर्थग्रहण एवं सराहना संबंधी प्रश्न—
प्रश्न (क) कवि ने भ्रम नष्ट होने तथा ज्ञान की प्राप्ति का रूपक किस की सहायता से बांधा है ?
(ख) तृष्णा रूपी छप्पर को भूमि पर किस ने गिरा दिया ? 
(ग) अज्ञान का अंधकार किस कारण क्षीण हुआ था ?
(घ) पद में निहित काव्य-सौंदर्य को प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर— (क) कवि ने भ्रम नष्ट होने तथा ज्ञान की प्राप्ति का रूपक मानव मन में भ्रम रूपी छप्पर के उड़ जाने से बांधा है ।
(ख) तृष्णा रूपी छप्पर को ज्ञान की तेज़ आंधी ने भूमि पर गिरा दिया था।
(ग) अज्ञान का अंधकार ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने से क्षीण हुआ था ।
(घ) कबीर ने ज्ञान और भक्ति के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए माना है कि इन्हीं से अज्ञान का नाश हो सकता है। तद्भव शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया गया है । लौकिक बिंबों की योजना बहुत सटीक और सार्थक है। स्वरमैत्री ने लयात्मकता की सृष्टि की है। अनुप्रास, सांगरूपक और रूपकातिशयोक्ति अलंकारों का सहज प्रयोग लाक्षणिकता ने कवि के कथन को गहनता प्रदान की है।
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
साखियाँ
प्रश्न 1. ‘मानसरोवर’ से कवि का क्या आशय है ?
उत्तर— ‘मानसरोवर’ संतों के द्वारा प्रयुक्त प्रतीक शब्द है जिस का अर्थ हृदय के रूप में लिया जाता है जो भक्ति-भावों से भरा हुआ हो।
प्रश्न 2. कवि ने सच्चे प्रेमी की क्या कसौटी बताई है ?
उत्तर— सच्चा प्रेमी संसार की सभी विषय वासनाओं को समाप्त कर देने की क्षमता रखता है। वह बुराई रूपी विष को अमृत में बदल देता है।
प्रश्न 3. तीसरे दोहे में कवि ने किस प्रकार के ज्ञान को महत्त्व दिया है ?
उत्तर— कबीर की दृष्टि में ऐसा ज्ञान अति महत्त्वपूर्ण है जो हाथी के समान समर्थ और शक्तिमान है। ज्ञान ही भक्ति मार्ग की ओर प्रवृत्त हो कर भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ता है और जीवात्मा को परमात्मा की प्राप्ति कराता है। वह राह में व्यर्थ की आलोचना करने वालों की ज़रा भी परवाह नहीं करता ।
प्रश्न 4. इस संसार में सच्चा संत कौन कहलाता है ?  
उत्तर— इस संसार में सच्चा संत वही है जो पक्ष-विपक्ष के विवाद में पड़े बिना सब को एक समान समझता है । वह लड़ाई-झगड़े से दूर रह कर ईश्वर की भक्ति में अपना ध्यान लगाता है । वह दुनियादारी के झूठे झगड़ों की ओर कभी नहीं बढ़ता।
प्रश्न 5. अंतिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने किस प्रकार की संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है ?
उत्तर— मनुष्य ईश्वर को पाना चाहता है पर वह सच्चे और पवित्र मन से ऐसा नहीं करना चाहता । वह दूसरों के बहकावे में आकर आडम्बरों के जंजाल को स्वीकार कर लेता है तथा धर्म के अलग-अलग आधार बना लेता है। हिंदू काशी से तो मुसलमान काबा से जुड़ कर ब्रह्म को पाना चाहते हैं। वे उस ब्रह्म को भिन्न-भिन्न नामों से पुकार कर स्वयं को दूसरों से अलग कर लेते हैं। वे भूल जाते हैं कि ब्रह्म एक ही है। जिस प्रकार मोटे आटे से मैदा बनता है पर लोग उन दोनों को अलग मानने लगते हैं। उसी प्रकार मनुष्य अलगअलग धर्म स्वीकार कर परमात्मा के स्वरूप को भी भिन्न-भिन्न मानने लगते हैं। जन्म से कोई छोटा-बड़ा, अच्छा-बुरा नहीं होता। हर व्यक्ति अपने कर्मों से जाना-पहचाना जाता है और उसी के अनुसार फल प्राप्त करता है, समाज में अपना नाम बनाता है। किसी ऊंचे वंश में उत्पन्न हुआ व्यक्ति यदि बुरे कर्म करे तो वह ऊंचा नहीं कहलाता | नीच कर्म करने वाला नीच ही कहलाता है।
प्रश्न 6. किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कुल से होती है या उसके कर्मों से। तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर— किसी भी व्यक्ति की पहचान उस के कर्मों से होती है न कि उस के कुल से। ऊंचे कुल में उत्पन्न होने वाला व्यक्ति यदि नीच कर्म करता है तो उसे ऊंचा नहीं माना जा सकता। वह नीच ही कहलाता है। सोने के बने कलश में यदि शराब भरी हो तो भी उस की निंदा ही की जाती है। सज्जन उस की प्रशंसा नहीं करते।
प्रश्न 7. काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए—
हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि ।
स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि ॥
उत्तर— देखिए साखी संख्या तीन के साथ दिया गया सराहना संबंधी प्रश्न ‘घ’ ।
सबद
प्रश्न 8. मनुष्य ईश्वर को कहां-कहां ढूंढ़ता फिरता है ?
उत्तर— मनुष्य ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मंदिर-मस्जिद में उसे ढूंढ़ता है। वह उसे काबा में ढूंढ़ता है, कैलाश पर्वत पर ढूंढ़ता है, वह उसे क्रिया-कर्म में ढूंढ़ता है, योगसाधनाओं में पाना चाहता है। वह उसे वैराग्य मार्ग पर चल कर पाना चाहता है।
प्रश्न 9. कबीर ने ईश्वर प्राप्ति के लिए किन प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है ?
उत्तर— कबीर ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है जो समाज में युगों से प्रचलित हैं। विभिन्न धर्मों को मानने वाले अपने-अपने ढंग से धार्मिक स्थलों पर पूजा-अर्चना करते हैं। हिंदू मंदिरों में जाते हैं तो मुसलमान मस्जिदों में कोई ब्रह्म की प्राप्ति के लिए तरह-तरह के क्रिया-कर्म करता है तो कोई योग-साधना करता है। कोई वैराग्य को अपना लेता है पर इससे उसकी प्राप्ति नहीं होती। कबीर का मानना है कि वह तो हर प्राणी में स्वयं बसता है। इसलिए उसे कहीं बाहर ढूंढ़ने का प्रयत्न पूरी तरह व्यर्थ है।
प्रश्न 10. कबीर ने ईश्वर को ‘सब स्वांसों की स्वांस में क्यों कहा है ?
उत्तर— ईश्वर हर प्राणी में है, वह कहीं भी बाहर नहीं है । वह तो उनकी स्वांसों की सांस में है। जब तक जीव की सांस चलती है तब तक वह जीवित है, प्राणवान है और सभी प्राणियों में ब्रह्म का वास है। इसीलिए कबीर ने ईश्वर को ‘सब स्वांसों की स्वांस में ‘ कहा है ।
प्रश्न 11. कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना सामान्य हवा से न कर आंधी से क्यों की ?
उत्तर— सामान्य हवा जीवन के लिए उपयोगी है। वह जीवन की आधार है पर उस में इतनी क्षमता नहीं होती कि दृढ़ता से बनी किसी छप्पर की छत को उड़ा सके, उसे नष्टभ्रष्ट कर सके। कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना आंधी से की है ताकि उस से भ्रम रूपी छप्पर उड़ जाए। माया उसे सदा के लिए बांध कर न रख सके । ज्ञान के द्वारा ही मन की दुविधा मिटती है, कुबुद्धि का घड़ा फूटता है।
प्रश्न 12. ज्ञान की आंधी का भक्त के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ? 
उत्तर— ज्ञान की आंधी से भक्त के जीवन से भ्रम दूर हो जाते हैं। माया उसे बांध कर नहीं रख सकती। उसके मन की दुविधा मिट जाती है। वह मोह-माया के बंधनों से छूट जाता है। अज्ञान और विषय-वासनाएं मिट जाती है, उनका जीवन में कोई स्थान नहीं रह जाता। शरीर कपट से रहित हो जाता है। ईश्वर के प्रेम और अनुग्रह की वर्षा होने लगती है। ज्ञान रूपी सूर्य के उदय हो जाने से अज्ञान का अंधकार क्षीण हो जाता है। परमात्मा की भक्ति का सब तरफ उजाला फैल जाता है।
प्रश्न 13. भाव स्पष्ट कीजिए—
(क) हिति चित्त की है धूंनी गिरांनी, मोह बलिंडा तूटा।
(ख) आंधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भीनां ।
उत्तर— (क) माया के द्वारा जीव को तब बहुत देर तक बांध कर नहीं रखा जा सकता जब ज्ञान रूपी आंधी बहने लगती है। इससे मन के दुविधा रूपी दोनों खंभे गिर जाते हैं जिन पर भ्रम रूपी छप्पर टिकता है। छप्पर का आधारभूत मोह रूपी खंभा टूट गया जिस कारण तृष्णा रूपी छप्पर भूमि पर गिर गया।
(ख) ज्ञान की आंधी के बाद भगवान् के प्रेम और अनुग्रह की जो वर्षा हुई उससे भक्त पूरी तरह प्रभु प्रेम के रस में भीग गए। उन का अज्ञान पूरी तरह मिट गया।
रचना और अभिव्यक्ति—
प्रश्न 14. संकलित साखियों और पदों के आधार पर कबीर के धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर— कबीर निर्गुण काव्य-धारा के वे संत थे जिन्होंने बड़े स्पष्ट रूप से अपने विचारों को प्रकट किया था। संकलित साखियों और पदों के आधार पर उनके धार्मिक और सामाजिक भेद-भाव प्रकट किए जा सकते हैं। उन्होंने प्रेम के महत्त्व, संत के लक्षण, ज्ञान की महिमा, बाह्याडंबरों का विरोध आदि भावों को प्रकट किया है। वे मानते हैं कि जब हृदय में भक्ति भाव पूर्ण रूप से भरे होते हैं तब हंस रूपी आत्माएं कहीं भी और नहीं जाना चाहतीं बल्कि वहीं से मुक्ति रूपी मोतियों को चुनना चाहती हैं। जब भक्त परस्पर मिल जाते हैं तो प्रभु भक्ति परिपक्व हो जाती है, तब उन्हें मायात्मक संसार के प्रति कोई रुचि नहीं रह जाती है। तब संसार की सभी विषय-वासनाएं मिट जाती हैं। मानव को ज्ञान रूपी हाथी पर सवार हो कर भक्ति मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते जाना चाहिए। उसे आलोचना करने वालों की कदापि परवाह नहीं करनी चाहिए। संत जन कभी पक्ष-विपक्ष के विवाद में नहीं पड़ते। जो व्यक्ति निरपेक्ष होकर ईश्वर के नाम में लीन हो जाते हैं वही चतुर ज्ञानी होते हैं। हिंदू और मुसलमान ईश्वर के वास्तविक सत्य को समझे बिना एक दूसरे के प्रति के दुराग्रह करते हैं। मनुष्य को इन से दूर रहकर सार्वभौम सत्य को समझना चाहिए। परमात्मा शाश्वत सत्य है । उस में कोई भेद नहीं पर अलग-अलग धर्मों को मानने वाले परमात्मा के स्वरूप में भी भेद करते हैं। इस संसार में व्यक्ति अपनी करनी से बड़ा बनता है न कि अपने ऊंचे परिवार से। ऊंचे परिवार में उत्पन्न सदा ऊंचा नहीं होता। मानव परमात्मा को प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के रास्ते अपनाते हैं। वे बाह्याडंबरों को अपनाते हैं पर इस से परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। परमात्मा न तो मंदिर में बसता है और न ही मस्जिद में। वह क्रिया – कर्मों, योग-साधना और वैराग्य से भी प्राप्त नहीं होता। वह तो हर प्राणी में है। यदि उसे प्राप्त करने की भावना हो तो वह मन की पवित्रता से पाया जा सकता है। जब हृदय में ज्ञान रूपी आंधी चलने लगती है तो सभी प्रकार के भ्रम दूर हो जाते हैं और माया जीव को बांध कर नहीं रख पाती। दुविधाएं समाप्त हो जाती हैं। जब परमात्मा के प्रेम की वर्षा होती है तो भक्त उस में पूरी तरह से भीग जाते हैं। ज्ञान का सूर्य उदित हो जाने पर अज्ञान का अंधकार मिट जाता है और परमात्मा की भक्ति का सर्वत्र उजाला हो जाता है।
भाषा अध्ययन—
प्रश्न 15. निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए—
पखापखी, अनत, जोग, जुगति, बैराग, निरपख ।
उत्तर— पखापखी = पक्ष-विपक्ष
अनत = अन्यत्र
जोग = योग
जुगति = युक्ति
बैराग = वैराग्य
निरपख = निरपेक्ष
पाठेत्तर सक्रियता— 
प्रश्न 1. कबीर की साखियों को याद कर कक्षा में अंत्याक्षरी का आयोजन कीजिए।
2. एन. सी. आर. टी. द्वारा कबीर पर निर्मित फिल्म देखें। 
उत्तर— अपने अध्यापक / अध्यापिका की सहायता से स्वयं कीजिए।
परीक्षोपयोगी अन्य प्रश्नोत्तर
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. कबीर के अनुसार ‘संत-सुजान’ कौन हो सकता है ? 
उत्तर— निष्पक्ष भाव से प्रभु स्मरण करने वाला।
प्रश्न 2. कबीर के अनुसार निर्गुण ब्रह्म कहाँ मिलता है ? 
उत्तर— सर्वत्र ।
प्रश्न 3. कबीर ने ईश्वर को कहाँ ढूँढ़ने के लिए कहा है ? 
उत्तर— अपने अन्दर ।
प्रश्न 4. ज्ञान की आँधी के आने से क्या समाप्त हो जाता है ?
उत्तर— भ्रम ।
प्रश्न 5. किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके किस से होती है ? 
उत्तर— कर्म से ।
प्रश्न 6. कवि ने संसार को किस का रूप माना है ?
उत्तर— स्वान का।
प्रश्न 7. ‘मुकताफल मुकता चुगै’ में ‘मुकता’ कौन हैं ?
उत्तर— भक्त जन ।
प्रश्न 8. खोजी को परमात्मा कितनी देर में मिल जाता है ? 
उत्तर— पल भर में।
प्रश्न 9. सांसारिक प्राणी किस झगड़े में उलझे हुए हैं ? 
उत्तर— पक्ष-विपक्ष के।
प्रश्न 10. ‘प्रेमी का प्रेमी मिलै’ से क्या होता है ?
उत्तर— विष अमृत हो जाता है।
प्रश्न 11. कबीर के दोहे सिक्खों के किस ग्रंथ में संकलित हैं ?
उत्तर— गुरु ग्रंथ साहिब में ।
प्रश्न 12. कबीर किस काल के कवि हैं ?
उत्तर— भक्ति काल ।

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